“भाषा से पहले शिक्षा बचाओ” – एक जरूरी सवाल उदय और राज ठाकरे से

आज जब देशभर में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, तब नेताओं का ध्यान भाषा की लड़ाई में उलझा हुआ है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे जैसे नेता हिंदी बनाम मराठी की बहस में उलझे हुए हैं, लेकिन सवाल उठता है – जब स्कूल ही नहीं बचेंगे, तो बच्चे किस भाषा में पढ़ेंगे?
देश के कई हिस्सों में – विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में – स्कूलों का बंद होना एक खतरनाक संकेत है। शिक्षा का यह ढांचा अगर कमजोर होता गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ भाषा, संस्कृति, विज्ञान या किसी भी विषय में सक्षम कैसे बनेंगी? स्कूल शिक्षा का आधार हैं – यही वो स्थान है जहाँ भाषा सीखी जाती है, संवेदनाएं विकसित होती हैं, और एक जिम्मेदार नागरिक तैयार होता है।
क्या यह ज्यादा जरूरी नहीं है कि हम पहले इस बात पर सवाल उठाएँ कि आखिर क्यों स्कूल बंद हो रहे हैं? क्यों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित किया जा रहा है? क्या शिक्षा अब केवल शहरी और अमीर वर्ग तक ही सीमित रह जाएगी?
राजनीतिक दलों को भाषा पर लड़ने से पहले शिक्षा की गिरती हालत पर एकजुट होकर आवाज़ उठानी चाहिए। वरना आने वाले समय में भाषा की लड़ाई भी बेमानी हो जाएगी – क्योंकि बोलने, पढ़ने और समझने वाले ही नहीं बचेंगे।
शिक्षा है तो भाषा है। स्कूल हैं तो भविष्य है।

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