संवाददाता शोएब म्यानुंर मुंबई
मुंबई : उर्दू बाल साहित्य गुलबुटे, सहाफत और समाजी मैदान में काबिले-ज़िक्र खिदमात अंजाम देने वाले मशहूर अदीब और एडिटर जनाब फारूक गुलाम नबी सैयद खान उर्फ “फारूक सैयद” का तवील बीमारी के बाद इंतिकाल हो गया। उनके इंतिकाल से उर्दू अदबी दुनिया में गहरा रंजो-ग़म पाया जा रहा है, खास तौर पर उर्दू बाल साहित्य के मैदान में इसे एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक उनका सुपुर्द-ए-ख़ाक मुंबई में किया जाएगा।
फारूक सैयद ने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी और फरोग़ के लिए वक्फ कर दी। बच्चों की अदबी और फिक्री तरबियत में उनका ख़ास किरदार रहा। वह इंडियन यूथ एसोसिएशन के साबक़ सदर भी रह चुके थे। इसके अलावा उन्होंने “उर्दू टाइम्स” के साबक़ एडिटर और “गुल बुटे” रिसाले के एडिटर के तौर पर भी अपनी खिदमात अंजाम दीं।
अपने नरम मिज़ाज, खुशअख़लाकी और मोहब्बत भरे रवैये की वजह से वह अदबी, सहाफती और दोस्ताना हलकों में बेहद मकबूल थे। पुराने दोस्तों से मोहब्बत से मिलना, उस्तादों और बुजुर्गों का एहतराम करना और हर शख्स से अपनाइयत के साथ पेश आना उनकी शख्सियत की खास पहचान थी।
उनके इंतिकाल पर समाजी, अदबी और सहाफती हलकों की कई नामवर शख्सियतों ने गहरे दुख का इज़हार किया है। कई लोगों ने उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि “उर्दू बाल साहित्य का एक रोशन सितारा हमेशा के लिए बुझ गया।”
मरहूम अपने पीछे खानदान, दोस्तों और चाहने वालों का एक बड़ा हल्का छोड़ गए हैं।

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